आचार्य भरत मुनि को रस संप्रदाय का प्रवर्तक (जनक) माना जाता है। उनके प्रसिद्ध ग्रंथ
'नाट्यशास्त्र' में रस की परिभाषा एक संस्कृत सूत्र के रूप में दी गई है:
"विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः।"
सूत्र का अर्थ:
विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग (मिलने) से ही
रस की निष्पत्ति (उत्पत्ति) होती है।
सरल शब्दों में:
भरत मुनि के अनुसार, जिस प्रकार अलग-अलग मसालों, औषधियों और पदार्थों के मिलने से स्वादिष्ट भोजन (रस) बनता है, ठीक उसी प्रकार नाटक या काव्य में जब स्थायी भाव के साथ विभाव, अनुभाव और संचारी भाव मिलते हैं, तो दर्शकों या पाठकों को जिस आनंद की अनुभूति होती है, उसे ही
'रस' कहा जाता है।